कटाक्ष :-जिसकी जितनी संख्या भारी, क्या वाकई उसकी उतनी हिस्सेदारी?"“Does greater numbers truly guarantee an equal share?”
- Swarn Singh
- 17 मार्च
- 7 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 19 घंटे पहले
आजकल हमारे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में एक नारा बहुत जोर-शोर से गूंजता है "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।" यह विचार सुनने में बड़ा 'लोकतांत्रिक' लगता है। लेकिन सोचिए, अगर यह फॉर्मूला इतना ही अचूक है, तो इसे ग्लोबल लेवल पर क्यों न लागू कर दिया जाए?
हम 141 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। अब समय आ गया है कि हम संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) का दरवाजा खटखटाएं और कहें, "भैया, अपना रजिस्टर चेक करो, हम दुनिया में फर्स्ट आ गए हैं! अब विश्व के संसाधनों पर हमारी हिस्सेदारी बढ़ाओ!" आखिर पूरी दुनिया भी तो डेमोक्रेसी का ही राग अलापती है!
यहीं पर डेमोक्रेसी का वह कड़वा पहलू बेनकाब होता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह 'गुणवत्ता' (Quality) से ज्यादा 'मात्रा' (Quantity) की पूजा करता है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा ड्रॉबैक यह है कि जो व्यक्ति या समाज समझदारी दिखाते हुए अपनी आबादी नियंत्रित करता है, अपने बच्चों को शिक्षित कर योग्य बनाता है, उसकी राजनीतिक हैसियत सिकुड़ जाती है। वहीं, जो बिना किसी प्लानिंग के बस बेतहाशा भीड़ बढ़ाता जाता है, उसे सत्ता का इनाम मिलता है।
अगर 'हिस्सेदारी' तय करने का कोई पैमाना होना ही चाहिए, तो वह सिर्फ 'भीड़' क्यों हो? आइए कुछ और तार्किक समाधानों पर विचार करते हैं:
समाधान 1: "जिसका जितना टैक्स भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी!"
देश की 141 करोड़ की आबादी में से मुट्ठी भर लोग ईमानदारी से डायरेक्ट इनकम टैक्स भरते हैं। लेकिन जब सुविधाओं और 'फ्रीबीज' के बंटवारे की बात आती है, तो यह सारा पैसा उस 'भारी संख्या' पर लुटा दिया जाता है जिसका टैक्स में कोई योगदान नहीं होता। अगर असली न्याय होना है, तो नारा होना चाहिए- "जिसका जितना टैक्स भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।" जो अर्थव्यवस्था का पहिया खींच रहा है, पहला हक उसका होना चाहिए।
समाधान 2: "देश के लिए जिसका जितना बलिदान भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी!"
पसीने (टैक्स) से भी ज्यादा कीमती होता है 'खून'। इतिहास गवाह है कि जब बात देश की सीमाओं की रक्षा करने या राष्ट्र की वेदी पर शीश चढ़ाने की आई, तो राजपूतों और सिखों का बलिदान सबसे अग्रणी रहा है। बर्बर,शक, हूण पठान, मुगल और अंग्रेजों से लड़ने से लेकर आज भारतीय सेना में सरहद पर छाती अड़ाने तक इन समुदायों ने अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं बहुत ज्यादा खून इस मिट्टी के लिए बहाया है। लेकिन आज के चुनावी गणित में इनकी 'संख्या' उतनी भारी नहीं है, इसलिए सिस्टम इनके योगदान को भूल जाता है।
समाधान 3: "जिसका जितना दान भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी!"
अगर योगदान का एक और पैमाना खोजना हो, तो वह 'संपत्ति और सत्ता का दान' होना चाहिए। आज जब लोग छोटी-छोटी मांगों और मुफ्त की योजनाओं के लिए सड़कें जाम कर देते हैं, तब इस देश का इतिहास एक अलग ही कहानी सुनाता है।
जब भारत आज़ाद हुआ, तो देश के एकीकरण (Unification) की सबसे बड़ी चुनौती सामने थी। तब राजपूत राजाओं ने बिना किसी खून-खराबे के अपनी सदियों पुरानी रियासतें, किले, खजाने और सत्ता नवभारत के निर्माण के लिए दान कर दिए। बदले में उन्होंने क्या मांगा? सिर्फ एक 'प्रिवी पर्स' (Privy Purse), जो उनके सम्मान के लिए एक संवैधानिक वादा था। लेकिन सत्ता के खेल में बाद में वह भी उनसे छीन लिया गया!
सबसे बड़ी बात इन राजाओं ने देश के लिए अपना पूरा राजपाट सौंप दिया, लेकिन सौदेबाजी में अपनी जाति या परिवार के लिए कभी 'आरक्षण' (Reservation) नहीं मांगा ! आज की राजनीति का विरोधाभास देखिए, जहाँ कुछ नहीं देने वाले सिर्फ अपनी 'भीड़' के दम पर सब कुछ मांग रहे हैं, और जिन्होंने अपना सब कुछ दे दिया, उन्हें इतिहास के पन्नों में हाशिए पर धकेल दिया गया।
डेमोक्रेसी तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक वह सिर्फ 'हेड काउंट' (सिरों की गिनती) पर चलती रहे। असली न्याय तब होगा जब हिस्सेदारी का पैमाना यह नहीं होगा कि "आप कितने पैदा हुए हैं", बल्कि यह होगा कि "आपने इस देश को कितना दिया है।"
जब तक 'योगदान' को 'भीड़' से ऊपर नहीं रखा जाएगा, तब तक यह सिस्टम सिर्फ मुफ्तखोरों और वोट-बैंक की राजनीति का गुलाम ही बना रहेगा।
These days, a slogan echoes loudly through our political and social discourse: “The greater the numbers, the greater the share.” At first glance, it sounds deeply “democratic.” But pause for a moment if this formula is truly so flawless, why not apply it at the global level?
We have crossed a population of 1.41 billion. Perhaps it is time we knock on the doors of the United Nations and say, “Brother, check your register we now rank first in the world! Increase our share of global resources!” After all, the entire world claims to sing the song of democracy.
The “Dark Side” of Democracy
Here lies the bitter truth—the darker face of democracy. Its greatest irony is that it often worships quantity over quality.
The biggest drawback of this system is that individuals or communities who act responsibly by controlling population and investing in education—find their political influence shrinking. Meanwhile, those who expand their numbers recklessly, without planning, are rewarded with power.
If “share” must be determined, why should numbers alone be the yardstick? Let us reflect on some more rational alternatives:
Solution 1: “The greater the tax contribution, the greater the share!”
Out of 1.41 billion people, only a handful honestly pay direct income tax. Yet when it comes to distributing benefits and “freebies,” this wealth is spent on the larger population that contributes little to taxation.
If true justice is the goal, the slogan should be: “The greater the tax contribution, the greater the share. ”Those who carry the weight of the economy deserve the first claim.
Solution 2: “The greater the sacrifice for the nation, the greater the share!”
More valuable than sweat (tax) is blood. History bears witness—when it came to defending the nation or laying down lives, communities like the Rajputs and Sikhs stood at the forefront.
From fighting invaders to guarding the borders even today, they have shed far more blood for this land than their population share might suggest. Yet, in the arithmetic of modern electoral politics, their numbers are not “heavy” enough so their contributions are often overlooked.
Solution 3: “The greater the sacrifice of power and wealth, the greater the share!”
If we seek another measure of contribution, let it be the willingness to give—of wealth, power, and privilege.
When India gained independence, the greatest challenge was national integration. It was then that many princely rulers especially Rajput kings voluntarily surrendered their centuries-old kingdoms, forts, treasuries, and authority for the creation of a united nation. In return, they asked only for a "Privy Purse" a symbolic assurance of dignity. Yet even that promise was later withdrawn.
The most striking truth? They gave away everything for the nation but never bargained for caste-based privileges or reservations for themselves.
Contrast this with today’s politics, where those who contribute little often demand everything on the strength of sheer numbers, while those who sacrificed the most are pushed to the margins of history.
A Closing Reflection
Democracy cannot truly succeed if it runs solely on a headcount. Real justice will emerge not from how many are born, but from how much is given back to the nation.
Until contribution is placed above crowd size, this system risks becoming a servant of populism, freebies, and vote-bank politics rather than a guardian of fairness and merit.
आजकाल आपल्या राजकीय आणि सामाजिक चर्चांमध्ये एक घोषणा मोठ्या जोरात ऐकू येते “ज्याची जितकी संख्या जास्त, त्याचा तितकाच हिस्सा.” ऐकायला ही कल्पना खूप ‘लोकशाहीवादी’ वाटते. पण थोडं थांबून विचार करा जर हा फॉर्म्युला इतकाच अचूक असेल, तर तो जागतिक पातळीवर का लागू करू नये?
आपण १४१ कोटींचा टप्पा ओलांडला आहे. आता वेळ आली आहे की आपण United Nations चं दार ठोठावून म्हणावं, “अहो, तुमचं रजिस्टर पाहा आम्ही जगात पहिल्या क्रमांकावर आलो आहोत! आता जागतिक संसाधनांमध्ये आमचा हिस्सा वाढवा!” शेवटी, संपूर्ण जग लोकशाहीचाच जयघोष करत नाही का?
लोकशाहीचा “डार्क साइड”
इथेच लोकशाहीचा कडू आणि लपलेला पैलू समोर येतो. लोकशाहीची सर्वात मोठी विडंबना म्हणजे ती गुणवत्तेपेक्षा संख्येची पूजा करते।
या व्यवस्थेचा सर्वात मोठा तोटा असा आहे की जे लोक किंवा समाज जबाबदारीने आपली लोकसंख्या नियंत्रणात ठेवतात, आपल्या मुलांना शिक्षित करून सक्षम बनवतात, त्यांची राजकीय ताकद कमी होत जाते. उलट, जे कोणत्याही नियोजनाशिवाय फक्त संख्या वाढवत राहतात, त्यांना सत्तेचं बक्षीस मिळतं।
जर ‘हिस्सा’ ठरवण्यासाठी काही निकष असावाच, तर तो फक्त संख्याच का असावा? चला, काही अधिक तर्कसंगत पर्याय पाहूया:
उपाय १: “ज्याचा जितका कर (Tax) जास्त, त्याचा तितकाच हिस्सा!”
देशाच्या १४१ कोटी लोकसंख्येतून फार थोडे लोक प्रामाणिकपणे थेट कर भरतात. पण जेव्हा सुविधा आणि ‘फ्रीबीज’ वाटण्याची वेळ येते, तेव्हा हाच पैसा त्या मोठ्या संख्येवर खर्च होतो, ज्यांचा करात काहीच वाटा नसतो।
जर खरा न्याय हवा असेल, तर घोषणा अशी असायला हवी:“ज्याचा जितका कर जास्त, त्याचा तितकाच हिस्सा.”जे अर्थव्यवस्थेचं ओझं उचलतात, त्यांनाच पहिला हक्क असायला हवा।
उपाय २: “देशासाठी ज्याचं जितकं बलिदान, त्याचा तितकाच हिस्सा!”
घामापेक्षा (करापेक्षा) अधिक मौल्यवान असतं ते रक्त. इतिहास साक्षी आहे—जेव्हा देशाच्या संरक्षणाचा प्रश्न आला, तेव्हा Rajputs आणि Sikhs यांचे बलिदान अग्रस्थानी राहिले।
आक्रमकांशी लढण्यापासून ते आज सीमांवर उभं राहण्यापर्यंत, या समाजांनी आपल्या लोकसंख्येच्या प्रमाणापेक्षा कितीतरी अधिक रक्त या मातीत सांडलं आहे. पण आजच्या निवडणूक गणितात त्यांची ‘संख्या’ जड नाही, म्हणून त्यांच्या योगदानाकडे दुर्लक्ष केलं जातं।
उपाय ३: “ज्याचं जितकं दान, त्याचा तितकाच हिस्सा!”
योगदान मोजायचं असेल, तर ‘संपत्ती आणि सत्तेचं दान’ हाही एक महत्त्वाचा निकष ठरू शकतो।
भारत स्वतंत्र झाला तेव्हा देशाच्या एकीकरणाचं मोठं आव्हान होतं. त्या वेळी अनेक राजपूत राजांनी आपली शेकडो वर्षांची राज्यं, किल्ले, खजिने आणि सत्ता नव्या भारतासाठी स्वेच्छेने अर्पण केली. बदल्यात त्यांनी फक्त प्रिव्ही पर्स मागितला जो त्यांच्या सन्मानासाठी दिलेला एक आश्वासक हक्क होता. पण नंतर तोही त्यांच्याकडून काढून घेतला गेला।
सर्वात मोठी गोष्ट म्हणजे त्यांनी देशासाठी सर्वस्व दिलं, पण कधीही स्वतःसाठी आरक्षणाची मागणी केली नाही।
आजच्या राजकारणातील विरोधाभास बघा ज्यांनी काही दिलं नाही, ते केवळ आपल्या ‘संख्येच्या’ जोरावर सर्व काही मागत आहेत; आणि ज्यांनी सर्वस्व दिलं, त्यांना इतिहासाच्या काठावर ढकललं गेलं।
शेवटचा विचार
लोकशाही तेव्हाच यशस्वी होईल, जेव्हा ती केवळ डोक्यांची संख्या मोजून चालणार नाही। खरा न्याय तेव्हाच मिळेल, जेव्हा निकष हा असेल “तुम्ही किती जन्माला आला आहात” नाही, तर “तुम्ही देशाला किती दिलं आहे.”
जोपर्यंत योगदानाला संख्येपेक्षा वरचं स्थान दिलं जाणार नाही, तोपर्यंत ही व्यवस्था फक्त मोफत योजनांवर आणि मतांच्या राजकारणावर चालणारी राहील।








Well Said sir , We are with you , keep going ❤️👌🏼👏🏼