जैसी करनी, वैसी भरनी: वैश्विक राजनीति और कर्मों का हिसाब
- Swarn Singh
- 13 मार्च
- 2 मिनट पठन
मेरे हाईस्कूल के दिनों में हमारे अंग्रेजी के शिक्षक, जयकृष्ण यादव जी, एक बात अक्सर दोहराया करते थे: "As you sow, so shall you reap" यानी जो जैसा बोएगा, वैसा ही काटेगा। उस समय यह केवल एक नैतिक शिक्षा लगती थी, लेकिन आज दुनिया के बदलते समीकरणों को देखकर समझ आता है कि प्रकृति और समय अपना हिसाब कितनी बारीकी से रखते हैं।
इतिहास का दोहराव
आज की वैश्विक उथल-पुथल को देखें तो जयकृष्ण सर जी की वह बात पूरी तरह चरितार्थ होती नजर आती है। कुछ समय पहले जिस तरह रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष की नींव रखी गई, उसमें एक बड़ी भूमिका 'लालच' और 'कूटनीति' की थी। यूक्रेन को नाटो (NATO) की सदस्यता का सपना दिखाकर जिस तरह युद्ध की आग में झोंका गया, उसके पीछे की राजनीति किसी से छिपी नहीं है।
लेकिन नियति का चक्र देखिए; आज वही अमेरिका, जिसने दूसरों के लिए बिसात बिछाई थी, खुद ईरान के साथ संघर्ष की जटिलताओं में उसी तरह उलझता दिखाई दे रहा है।
प्रकृति का न्याय: हिसाब बराबर है
राजनीति के गलियारों में इसे 'जियोपॉलिटिक्स' कहा जा सकता है, लेकिन साधारण शब्दों में यह वही शाश्वत सत्य है हिसाब बराबर करना। जब आप दूसरों के आंगन में असुरक्षा के बीज बोते हैं, तो देर-सबेर वह अशांति आपके अपने दरवाजे तक भी दस्तक देती है।चाहे वह कोई महाशक्ति हो या कोई व्यक्ति, ईश्वरीय विधान या प्रकृति का नियम सबके लिए समान है।
ईरान और अमेरिका के बीच गहराता यह तनाव केवल एक सैन्य मुद्दा नहीं है, बल्कि एक कड़ा सबक है। यह याद दिलाता है कि सत्ता और संसाधनों के खेल में हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे निर्णय लौटकर हमारे पास ही आते हैं। जैसा कि यादव जी कहते थे, प्रकृति अपना बही-खाता हमेशा दुरुस्त रखती है। आज दुनिया जो देख रही है, वह शायद उसी पुराने बोए हुए बीज की फसल है।






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