शीर्षक: ये कैसा भाईचारा है ? Title: What Kind of Brotherhood Is This?
- Swarn Singh
- 6 मार्च
- 10 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 5 दिन पहले
यह कविता वर्तमान समय के सबसे ज्वलंत और संवेदनशील प्रश्नों पर खड़ी है। इसे लिखते समय यदि मेरी कलम में थोड़ी साम्प्रदायिकता की गंध आती है, तो मैं पूरी ईमानदारी और विनम्रता के साथ इसे स्वीकार करता हूँ। अक्सर 'साम्प्रदायिकता' शब्द का प्रयोग उग्र धार्मिकता के संदर्भ में किया जाता है, तो हाँ, मैं उग्र हूँI मैं ऐसा था नहीं, लेकिन परिस्थितियों ने मुझे ऐसा होने पर विवश कर दिया है। इसके लिए मेरे पास पुख्ता वजह भी है I हो सकता है आप मुझे 'कलम का दंगाई' कहें I आपकी कट्टरता तो धर्मनिरपेक्षता के हिजाब में ढँक जाती है, लेकिन मेरी थोड़ी सी मुखरता आपको बर्दाश्त नहीं होती। हमें तो मुग़ल इतिहास के क्रूरता का सच भी धर्मनिरपेक्षता के हिजाब से ढँक कर दिखाना पड़ता है I याद कीजिए छावा सिनेमा का डायलॉग जो "हिन्दवी स्वराज" की जगह सिर्फ "स्वराज" से बदल दिया गया I और गोधरा जैसी नृसंह नरसंहार पर बनी साबरमती सिनेमा में बार बार बोला गया जो धर्म का कोई एंगल ही नहीं था I क्या है ये सब ? धर्मनिरपेक्षता का हिजाब ही तो है I इसीलिए यह कविता आपको आगाह करने के लिए है कि अब 'शुतुरमुर्ग' बनकर रेत में सिर छिपाने का वक्त गया।
यह सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग है, जहाँ सच जंगल की आग से भी तेज फैलता है। अब मजहबी कट्टरता हिजाब में भी छिप नहीं पा रही है; कुछ लोग तो अब हिजाब भी खींचने खींचने लग गए है I इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए, मैंने भी भाईचारे की चादर के नीचे छिपी कट्टरता को मर्यादा में रहते हुए उघाड़ने की कोशिश की है, ताकि आपको मेरे जख्म भी दिखें और यह 'दिखावटी भाईचारा' भी बेनकाब हो। बुरा मत मानियेगा, क्योंकि गिले-शिकवे तो अपनों से ही होते हैं। यदि हमें साथ रहना है, तो शिकायतों का निबटारा भी जरुरी है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगेश्वर कृष्ण के वंशजों को आजादी और धर्म के आधार पर हुए बंटवारे के बाद क्या-क्या नहीं सहना पड़ा? सहिष्णुता की अफीम चाटकर हम सोते रहे, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि अपना वजूद बचाना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। हम हिन्दुओं की हालत तो अपने ही देश में भेड़िये के मुंह में दबे उस मेमने की तरह है जिसकी हड्डी भेड़िये को चुभ जाती है तो भेड़िया हिकारत से मेमने को कहता है "हिंसक कहीं का "I मैं अपनी इस बेबसी और इस 'छद्म भाईचारे' की हकीकत को एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ:-
"दो भाइयों का बंटवारा हुआ। दोनों ने अपने-अपने हिस्से का घर बसा लिया। अत्यधिक स्नेह के कारण दोनों के कुछ बच्चे चाचा-ताऊ के पास रह गए। बड़े भाई (भारत) ने छोटे भाई के बच्चों को सीने से लगाया, फलने-फूलने का अवसर दिया और सारी रंजिशें भुलाकर उन्हें घर का मालिक तक बना दिया। लेकिन इसके ठीक उलट, छोटे भाई (पाकिस्तान) ने बड़े भाई के बच्चों पर जुल्म की सारी हदें पार कर दीं। उनका मानसिक और शारीरिक शोषण किया, धर्म बदला और अपने असली पिता को भुलाने पर मजबूर कर दिया। बड़े भाई ने जब भी सवाल किया, छोटे ने इसे 'अपने घर का अंदरूनी मामला' बताकर चुप करा दिया। विडंबना देखिए, छोटा भाई अपने बच्चों के कथित भेदभाव पर तो दुनिया सिर पर उठा लेता है, लेकिन बड़े भाई के घर के एक कमरे (कश्मीर) पर बेवजह अपना हक़ जताता है और दूसरे हिस्से (POK) पर कब्जा जमाए बैठा है। बड़े भाई के अपने ही बच्चे (कश्मीरी हिन्दू) अपने ही घर में शरणार्थी बन गए। उन्हें आरे से चीरा गया, इज्जतें लूटी गईं और गोलियों से भूना गया। और इधर? इधर बड़ा भाई अपने ही घर में धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे का पाठ पढ़ता और पढ़ाता रहा I
फिर उस छोटे भाई के बच्चों (कट्टरपंथी सोच) में इतना दुस्साहस आ गया कि वे बड़े भाई के शयनकक्ष तक पर वक्फ बोर्ड के नाम पर दावा ठोकने लगे I
गलती बड़े भाई के उन 'रहनुमाओं' की भी है जिन्होंने झूठे बड़प्पन की खातिर अपने ही बच्चों के साथ नाइंसाफी की। जब छोटे भाई के बच्चों की नीयत बेनकाब होने लगी और बड़े भाई के बच्चों ने आवाज उठाई, तो उन पर ही 'असहिष्णु' और ' धर्मांध ' होने का ठप्पा लगा दिया गया। "
यह कहानी मात्र कहानी नहीं, हमारा इतिहास और वर्तमान है। फैसला आपको करना है कि गलती किसकी है? चिंता का विषय यह है कि अब आतंक का चेहरा बदल गया है। पहले अशिक्षित भटके हुए लोग थे, अब चार्टर्ड अकाउंटेंट और डॉक्टर जैसे पेशे से जुड़े लोग बम धमाकों और आतंकी साजिशों में शामिल हो रहे हैं। दिल्ली लालकिले पर ब्लास्ट की घटना ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह सिर्फ़ अपराध नहीं, यह उस शिक्षा की त्रासदी है:
"जिन हाथों ने क़सम खाई थी, जीवन को बचाने की,
उनका बम-ब्लास्ट में शामिल होना, त्रासदी है पढ़ाई की I
जब डॉक्टर आतंक के सौदे में उतरे, और ऐसा पेशा बन जाए छल,
तो सभ्यता रोती है चुपचाप, और झुक जाता है नैतिक बल I
जो नारे कभी हमें 'सुनी-सुनाई बातें' लगते थे जैसे "गजवा-ए-हिन्द" या "सर तन से जुदा" आज वे हकीकत बनकर हमारे सामने खड़े हैं। चाहे दिल्ली का दंगा हो, पहलगाम में धर्म पूछकर की गई हत्या, या बांग्लादेश में दीपू दास को जिंदा जलाने की घटना भविष्य की कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है।
यहाँ मैं किसी धार्मिक ग्रंथ का हवाला नहीं देना चाहता, लेकिन दो विचारधाराओं में एक बुनियादी मतभेद है। हिन्दू धर्म का आधार 'मूर्ति पूजा' है, जबकि इस्लाम में 'बुतपरस्ती' (मूर्ति पूजा) हराम है। जहाँ "सूरह-अत-तौबा (9:5)" जैसे आदेश स्पष्ट हों, वहाँ भाईचारा केवल एक 'राजनीतिक छलावा' है।
भाईचारे की एक और मिसाल देखिए बंगाल में फिर से बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणाI क्या आप कल्पना
कर सकते हैं कि पाकिस्तान या बांग्लादेश में कोई 'राम मंदिर' बनाने की घोषणा करे? बाबर और औरंगजेब आक्रांता थे, हैं और रहेंगे। लेकिन तकलीफ तब होती है जब हमारे ही बीच के कुछ लोग, जो इतिहास में तलवार के डर से धर्मांतरित हुए थे, आज उन्हीं विदेशी आक्रांताओं को अपना हीरो मानने लगते हैं।
आपको दुनिया भर के मुसलमानों की तकलीफ की फिक्र है, रोहिंग्या और गाजा के लिए आपकी रैलियां निकलती हैं, लेकिन अपने ही पड़ोस में, अपने ही देश में हिंदुओं पर होते अत्याचार पर आपकी चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।
मेरी यह कविता इसी 'चुप्पी' को तोड़ने और इस 'एकतरफा भाईचारे' पर सवाल उठाने का एक छोटा सा प्रयास है। मैं मानता हूँ, मैंने तीन उँगलियाँ उठाई है और अब भी एक ऊँगली मेरी तरफ ही है I ये मेरी ईमानदारी है I
This poem stands upon some of the most burning and sensitive questions of our time. While writing it, if there appears even a slight scent of communalism in my words, I Accept it with complete honesty and humility. The word “communalism” is often used in the context of intense religious assertion then yes, I am intense. I was not always like this, but circumstances have compelled me to become so, and I have strong reasons for it. You may call me a “rioter of the pen.” Your rigidity hides behind the veil of secularism, yet my small outspokenness becomes intolerable to you. Even the brutal truths of Mughal history must be shown wrapped in that same veil of secularism. Recall how, in the film Chhava, the phrase “Hindavi Swaraj” was reduced to just “Swaraj.” Or how, in films on incidents like Godhra, the religious angle was repeatedly denied. What is all this, if not that same veil?
This poem is meant as a warning that the time to bury our heads in the sand like an ostrich has passed.
This is the age of social media and artificial intelligence, where truth spreads faster than wildfire. Now, even religious extremism can no longer hide behind veils; some have begun pulling those veils away. In that same spirit, I have tried—within the bounds of dignity to uncover the extremism hidden beneath the sheet of “brotherhood,” so that you may see both my wounds and this façade exposed. Do not take offense, for grievances arise only among one’s own. If we are to live together, these grievances must be addressed.
What have the descendants of Lord Ram and Lord Krishna not endured after the partition of the country on the basis of religion? Intoxicated by the opium of tolerance, we kept sleeping but now the water has risen above our heads. The situation has reached a point where preserving our very existence has become the greatest challenge. The condition of Hindus in their own land resembles a lamb caught in a wolf’s jaws if a bone pricks the wolf, it scorns the lamb as “violent.”
Let me explain this helplessness and this “pseudo-brotherhood” through a small story:
Two brothers separated and built their own homes. Out of affection, some children stayed with their uncles. The elder brother (India) embraced the younger brother’s children, gave them opportunities, and even made them masters of the house. But the younger brother (Pakistan), in contrast, crossed all limits of cruelty toward the elder brother’s children subjecting them to mental and physical oppression, forcing conversions, and making them forget their roots. Whenever the elder brother raised questions, the younger dismissed it as an “internal matter.” Ironically, the younger brother raises global outcry over alleged discrimination against his own children, yet lays unjust claims over one room (Kashmir) of the elder’s house and occupies another part (POK). Meanwhile, the elder brother’s own children (Kashmiri Hindus) became refugees in their own home—torn apart, dishonored, and killed while the elder brother continued preaching secularism and brotherhood.
Over time, the younger brother’s children (extremist thinking) grew so audacious that they began staking claims even over the elder brother’s private space in the name of institutions like the Waqf Board.
The fault also lies with the elder brother’s own “leaders,” who, in pursuit of false greatness, did injustice to their own people. When the intentions of the younger side were exposed and voices were raised, those voices were labeled “intolerant” and “fanatic.”
This is not just a story it is our history and our present. The judgment is yours: who is at fault?
What is alarming is that the face of terror has changed. Earlier, it involved misguided, uneducated individuals; today, even professionals like chartered accountants and doctors are being found in terror plots. Incidents like blasts near the Red Fort in Delhi force us to reflect. This is not just crime it is a tragedy of education:
“Hands that once swore to save lives,Now part of bomb blasts—what a tragedy of learning.When doctors enter the trade of terror,Civilization weeps silently, and morality bows down.”
Slogans that once seemed like distant echoes such as “Ghazwa-e-Hind” or “Sar Tan Se Juda” now stand before us as harsh realities. Whether it is riots in Delhi, killings after religious identification in places like Pahalgam, or brutal incidents in neighboring countries the very thought of the future sends shivers down the spine.
I do not wish to quote religious texts here, but there exists a fundamental ideological difference. The foundation of Hinduism includes idol worship, while in Islam, it is forbidden. Where such irreconcilable positions exist, “brotherhood” often becomes a political illusion.
Look at another example calls in Bengal for rebuilding structures like the Babri Masjid. Can one even imagine a similar announcement for building a Ram temple in Pakistan or Bangladesh? Invaders like Babur and Aurangzeb were, are, and will remain invaders. But the pain deepens when some among us whose ancestors converted under fear begin to glorify those very invaders.
There is concern for Muslims across the world; rallies are held for Rohingya and Gaza. But the silence over the suffering of Hindus in one’s own neighborhood and nation speaks volumes.
This poem is a small attempt to break that silence and question this one-sided “brotherhood.” I admit while three fingers point outward, one still points back at me. That, too, is my honesty.
"ही कविता आजच्या काळातील सर्वात ज्वलंत आणि संवेदनशील प्रश्नांवर उभी आहे. ती लिहिताना माझ्या शब्दांत जर थोडीशीही सांप्रदायिकतेची झलक जाणवत असेल, तर मी ती पूर्ण प्रामाणिकपणे आणि नम्रतेने स्वीकारतो. ‘सांप्रदायिकता’ हा शब्द अनेकदा उग्र धार्मिकतेसाठी वापरला जातो तर हो, मी उग्र आहे. मी पूर्वी असा नव्हतो, पण परिस्थितींनी मला तसा बनवले आहे, आणि त्यामागे ठोस कारणेही आहेत. कदाचित तुम्ही मला “लेखनाचा दंगेखोर” म्हणाल. तुमची कट्टरता धर्मनिरपेक्षतेच्या पडद्याआड लपते, पण माझी थोडीशी स्पष्टवक्तेपणा तुम्हाला सहन होत नाही. मुघल इतिहासातील क्रौर्याचे सत्यही धर्मनिरपेक्षतेच्या पडद्याखाली दाखवावे लागते. ‘छावा’ चित्रपटातील “हिंदवी स्वराज” हा शब्द फक्त “स्वराज” असा बदलला गेला, किंवा गोधरा घटनेवर आधारित कथांमध्ये धार्मिक पैलू नाकारला गेला हे सगळं काय आहे? तोच धर्मनिरपेक्षतेचा पडदा नाही का?
ही कविता तुम्हाला सावध करण्यासाठी आहे आता शुतुरमुर्गासारखे वाळूत डोके लपवण्याचा काळ संपला आहे.
हे सोशल मीडिया आणि कृत्रिम बुद्धिमत्तेचं युग आहे, जिथे सत्य जंगलातील आगीसारखं वेगाने पसरतं. आता धार्मिक कट्टरता पडद्याआडही लपून राहत नाही; काही लोक तर तो पडदाही हटवू लागले आहेत. त्याच परंपरेत, मीही ‘भाईचारा’च्या नावाखाली लपलेली कट्टरता मर्यादेत राहून उघड करण्याचा प्रयत्न केला आहे, जेणेकरून तुम्हाला माझ्या जखमाही दिसाव्यात आणि हा दिखाऊ भाईचारा देखील उघड व्हावा. राग मानू नका, कारण तक्रारी तर आपल्या माणसांशीच केल्या जातात. जर आपल्याला एकत्र राहायचं असेल, तर या तक्रारी सोडवणंही आवश्यक आहे।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम आणि योगेश्वर कृष्ण यांच्या वंशजांनी देशाच्या फाळणीनंतर किती काही सहन केलं आहे! सहिष्णुतेच्या अफूने आपण झोपलो होतो, पण आता परिस्थिती हाताबाहेर गेली आहे. आज आपलं अस्तित्व टिकवणं हीच सर्वात मोठी लढाई झाली आहे. आपल्या देशातच हिंदूंची अवस्था त्या कोकरासारखी झाली आहे, ज्याला लांडग्याने तोंडात पकडलं आहे आणि जर त्याची हाडं लांडग्याला टोचली, तर तोच कोकरू ‘हिंसक’ ठरतो।
मी ही असहाय्यता आणि हा ‘छद्म भाईचारा’ एका छोट्या कथेद्वारे सांगण्याचा प्रयत्न करतो:
दोन भावांचा विभाजन झाला. दोघांनी आपापली घरे वसवली. प्रेमामुळे काही मुले काका-ताऊकडे राहिली. मोठ्या भावाने (भारत) लहान भावाच्या मुलांना जवळ घेतले, त्यांना वाढण्याची संधी दिली, आणि सर्व वैर विसरून त्यांना घराचा मालकही बनवलं. पण लहान भावाने (पाकिस्तान) मोठ्या भावाच्या मुलांवर अत्याचार केले—मानसिक आणि शारीरिक छळ, धर्मांतर, आणि त्यांना त्यांच्या मूळ ओळखीपासून दूर नेलं. मोठ्या भावाने प्रश्न विचारले की, ते ‘आतील प्रकरण’ म्हणून दाबले गेले. विडंबना अशी की लहान भाऊ आपल्या मुलांवरील कथित अन्यायावर जगभर आवाज उठवतो, पण मोठ्या भावाच्या घरातील एका भागावर (काश्मीर) हक्क सांगतो आणि दुसऱ्या भागावर (POK) कब्जा करून बसतो. मोठ्या भावाची स्वतःची मुले (काश्मिरी हिंदू) आपल्या घरातच निर्वासित बनली त्यांच्यावर अत्याचार झाले, हत्या झाल्या आणि इथे मोठा भाऊ धर्मनिरपेक्षतेचे धडे देत राहिला।
नंतर लहान भावाच्या मुलांमध्ये इतका धाडस आला की त्यांनी मोठ्या भावाच्या खासगी जागेवरही दावे करायला सुरुवात केली।
चूक मोठ्या भावाच्या त्या ‘नेत्यांची’ही आहे, ज्यांनी खोट्या मोठेपणासाठी आपल्या लोकांवर अन्याय केला. जेव्हा सत्य समोर येऊ लागलं आणि आवाज उठले, तेव्हा त्या आवाजांना ‘असहिष्णु’ आणि ‘धर्मांध’ ठरवलं गेलं।
ही फक्त कथा नाही—हा आपला इतिहास आणि वर्तमान आहे. निर्णय तुमचा आहे—चूक कोणाची?
चिंतेची गोष्ट म्हणजे दहशतवादाचा चेहराही बदलला आहे. पूर्वी भटकलेले, अशिक्षित लोक यात होते; आता डॉक्टर आणि चार्टर्ड अकाउंटंटसारखे सुशिक्षित लोकही यात सामील होत आहेत. दिल्लीतील घटनांनी आपल्याला विचार करायला भाग पाडलं आहे. हे फक्त गुन्हे नाहीत—ही शिक्षण व्यवस्थेची शोकांतिका आहे:
“ज्या हातांनी जीव वाचवण्याची शपथ घेतली,तेच हात स्फोटात सामील झाले ,ही शिक्षणाची शोकांतिका आहे.जेव्हा डॉक्टरही दहशतीत उतरतात,तेव्हा सभ्यता शांतपणे रडते आणि नैतिकता झुकते.”
“गजवा-ए-हिंद” किंवा “सर तन से जुदा” सारखे नारे जे कधीकाळी फक्त ऐकिव वाटायचे, ते आज वास्तव बनले आहेत. दिल्लीतील दंगे, पहलगाममधील हत्या किंवा शेजारील देशांतील घटना—या सगळ्यांनी भविष्याची भीती वाढवली आहे।
मी येथे कोणत्याही धार्मिक ग्रंथाचा उल्लेख करणार नाही, पण दोन विचारसरणींमध्ये मूलभूत फरक आहे. हिंदू धर्मात मूर्तिपूजा आहे, तर इस्लाममध्ये ती निषिद्ध आहे. अशा परिस्थितीत ‘भाईचारा’ हा अनेकदा फक्त राजकीय भ्रम ठरतो।
बंगालमधील काही घोषणांवरूनही हे दिसतं. पाकिस्तान किंवा बांग्लादेशात ‘राम मंदिर’ उभारण्याची कल्पनाही करता येईल का? बाबर आणि औरंगजेब आक्रमक होते आणि राहतील. पण वेदना तेव्हा होते, जेव्हा आपल्यातलेच काही लोक त्यांना आपला नायक मानतात।
जगभरातील मुस्लीमांच्या समस्यांबद्दल सहानुभूती व्यक्त होते, पण आपल्या देशातील हिंदूंवर होणाऱ्या अत्याचारांबद्दलची शांतता बरेच काही सांगते।
ही कविता त्या शांततेला तोडण्यासाठी आणि या एकतर्फी ‘भाईचाऱ्याला’ प्रश्न विचारण्यासाठी एक छोटासा प्रयत्न आहे. मी मान्य करतो तीन बोटं इतरांकडे आहेत, पण एक अजूनही माझ्याकडेच आहे. हीच माझी प्रामाणिकता आहे।








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