
"भूख की कोई जाति नहीं,
न रोटी की कोई भाषा है"

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आज के सिनेमाई दौर में एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। कभी सिनेमा का उद्देश्य समाज को आईना दिखाना और नैतिकता का पाठ पढ़ाना होता था, लेकिन आज का 'ब्लॉकबस्टर फॉर्मूला' कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। हालिया फिल्मों के किरदारों, विशेषकर 'धुरंधर' के रहमान डकैत के प्रति बढ़ती दीवानगी ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है: क्या हमारा समाज डकैतों और अपराधियों में अपना 'रोल मॉडल' तलाश रहा है?
अपराध का 'स्वैग' और नैतिकता का पतन
रहमान डकैत जैसा चरित्र, जो एक दुश्मन देश का मामूली अपराधी है, आज भारत के संभ्रांत कॉरपोरेट जगत से लेकर गलियों तक में 'फेमस' हो चुका है। लोग उसके अपराधों, उसकी क्रूरता और उसके काले कारनामों को भूलकर उसके 'स्वैग' और बोलने के तरीके की नकल कर रहे हैं।
"जब समाज अपराधी के कृत्य से घृणा करने के बजाय उसके जूतों और चाल-ढाल की चर्चा करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नैतिक पतन की जड़ें गहरी हो चुकी हैं।"
सिनेमा कभी समाज का दर्पण कहा जाता था। दर्पण वह होता है जो चेहरा दिखाए, चेहरा बनाए नहीं। पर आज लगता है कि दर्पण ही चेहरा गढ़ने लगा है।
कुछ वर्ष पहले जब बाहुबली: द बिगिनिंग आई थी, तब उसमें शक्ति थी, पर साथ में एक सकारात्मक संवाद, नैतिक द्वंद्व और धर्म-अधर्म की स्पष्ट रेखा भी थी। नायक का वैभव था, पर उसके पीछे त्याग और संघर्ष का ताना-बाना भी था।
फिर धीरे-धीरे परदे पर अंधेरे के रंग गहरे होने लगे।
KGF: Chapter 1 और KGF: Chapter 2
इन फिल्मों ने एक अपराधी को शैली, संवाद और बैकग्राउंड म्यूज़िक की चकाचौंध में ऐसा ढाला कि उसके हिंसक कर्म पीछे छूटते गए और उसका “स्वैग” आगे निकल आया। दर्शक भूल गए कि सोने की खान पर खड़ा वह नायक दरअसल अपराध की नींव पर साम्राज्य खड़ा कर रहा है।
Pushpa: The Rise और Pushpa 2: The Rule
यहाँ भी वही कथा गैरकानूनी व्यापार, तस्करी, सत्ता को चुनौती, और फिर संवादों की ऐसी प्रस्तुति कि युवा वर्ग उस चाल-ढाल को अपनाने में गौरव महसूस करने लगे। “झुकेगा नहीं” जैसे संवाद आत्मसम्मान के प्रतीक बन गए, जबकि मूल चरित्र कानून और व्यवस्था को चुनौती दे रहा था।
और अब “रहमान डकैत” जैसे पात्र जो दुर्दांत अपराधी हैं उन्हें इस तरह गढ़ा जाता है कि उनके घिनौने कर्मों का दूसरा चेहरा धुंधला पड़ जाता है। पुलिस को मार खाते देख तालियाँ बजती हैं, अवैध धन से किए गए कुछ दान-पुण्य दिखाकर चरित्र को मानो शुद्ध कर दिया जाता है। यह खतरनाक सरलीकरण है।
कभी चंबल के बीहड़ों में डकैतों की चर्चा होती थी। उन पर फिल्में भी बनती थीं, पर उन्हें नायकत्व का मुकुट नहीं पहनाया जाता था। अपराध अपराध था भले ही उसके पीछे सामाजिक कारण हों। आज कैमरा अपराध को सौंदर्यशास्त्र में लपेट देता है। धीमी चाल, गूंजता संगीत, भारी संवाद और बस, नकारात्मकता एक आकर्षक पैकेज में बदल जाती है।
यह प्रश्न गंभीर है क्या सिनेमा समाज को दिशा दे रहा है, या समाज की विकृत रुचियाँ सिनेमा को दिशा दे रही हैं? शायद दोनों का एक चक्र है, जिसमें एक दूसरे को पोषित कर रहे हैं। पर इस चक्र का सबसे बड़ा शिकार नई पीढ़ी है।
युवा मन बहुत कोमल होता है। वह शक्ति से आकर्षित होता है, विद्रोह से प्रभावित होता है। यदि उसे यह दिखाया जाए कि नियम तोड़कर, हिंसा कर, व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर भी आप “हीरो” बन सकते हैं तो उसके अवचेतन में एक बीज पड़ता है। वह बीज धीरे-धीरे सोच को दीमक की तरह खोखला कर सकता है।
सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं है; यह सांस्कृतिक शक्ति है। जिस देश ने राम, कृष्ण, बुद्ध और विवेकानंद जैसे आदर्शों को अपनी चेतना में बसाया, वहाँ यदि अपराधी के स्वैग को सफलता का प्रतीक बना दिया जाए, तो यह चिंतन का विषय है।
समाधान क्या है?
सेंसरशिप नहीं, बल्कि संवेदनशीलता। फिल्मकारों को यह समझना होगा कि वे केवल कहानी नहीं बेच रहे, वे विचार भी बो रहे हैं। दर्शकों को भी विवेक से देखना होगा चरित्र और चरित्र-चित्रण में अंतर समझना होगा।
परदे की रोशनी क्षणिक होती है, पर उसका प्रभाव स्थायी हो सकता है। यदि हम सावधान न हुए, तो आने वाली पीढ़ी संवाद तो याद रखेगी, पर मूल्य भूल जाएगी। और तब शायद हमें फिर से पूछना पड़ेगा हमने दर्पण को चेहरा बनाने का अधिकार क्यों दे दिया?सिनेमा की ताकत असीमित है, लेकिन जब यह ताकत 'नकारात्मकता' को 'सकारात्मकता' का जामा पहनाकर बेचने लगे, तो यह खतरे की घंटी है। 'रहमान डकैत' जैसे किरदारों का कॉरपोरेट कल्चर में भी कॉपी होना यह दर्शाता है कि हम सफलता और पावर के इतने भूखे हो गए हैं कि हमें उसका स्रोत (Source) गलत होने से अब कोई फर्क नहीं पड़ता। समय आ गया है कि एक दर्शक के तौर पर हम तय करें कि हम किसे अपना 'हीरो' चुन रहे हैं। Writer: स्वर्ण सिंह