लोकतंत्र में वंशवाद: राजा का बेटा अब भी राजा:-
- Swarn Singh
- Mar 11
- 2 min read
Updated: Apr 14
भारतीय राजनीति के मंच पर एक संवाद सबसे अधिक गूँजा है: "राजा का बेटा अब राजा नहीं बनेगा, बल्कि वही राजा बनेगा जो उसका हकदार होगा।" यह कथन सुनने में जितना लोकतान्त्रिक और आदर्शवादी लगता है, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इसकी वास्तविकता उतनी ही धुंधली दिखाई पड़ती है। जब नेतृत्व की कमान योग्यता के बजाय वंशावली के आधार पर सौंपी जाती है, तो यह न केवल लोकतंत्र की मूल भावना पर चोट करता है, बल्कि नागरिकों के भरोसे को भी कमज़ोर करता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति समान अवसर है। जब राजनीतिक दल 'वंशवाद' को ही संगठन का आधार बना लेते हैं, तो वे अनजाने में एक नए प्रकार के 'सामंतवाद' को जन्म देते हैं। एक सामान्य कार्यकर्ता, जिसके पास संसाधन नहीं हैं लेकिन क्षमता और ज़मीनी पकड़ है, वह खुद को व्यवस्था से बाहर महसूस करने लगता है।
भारत में विडंबना यह है कि हम 'लोकतांत्रिक देश' तो हैं, लेकिन हमारे अधिकांश 'राजनीतिक दल' लोकतांत्रिक नहीं हैं। दलों के भीतर आंतरिक चुनाव (Internal Democracy) का अभाव होने के कारण नेतृत्व का चयन बंद कमरों में होता है। ऐसे में 'योग्यता' की परिभाषा बदलकर 'वफादारी' और 'पारिवारिक नाम' तक सीमित रह जाती है।
वंशवाद केवल नेताओं की ज़िम्मेदारी नहीं है, इसमें मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कई बार जनता भी परिचित चेहरों और 'विरासत' (Legacy) को वोट देना पसंद करती है। यह एक मनोवैज्ञानिक चक्र है जहाँ पार्टियाँ जोखिम लेने के बजाय 'ब्रांड वैल्यू' (Brand Value) का सहारा लेती हैं, भले ही वह ब्रांड केवल सरनेम के आधार पर बना हो। जब सत्ता का हस्तांतरण केवल एक परिवार के भीतर होता है, तो इसके गंभीर परिणाम होते हैं, यह व्यवस्था धीरे-धीरे “आधुनिक सामंतवाद” का रूप लेने लगती है।



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