अब 'विश्वगुरु' बनना बाकी है !
- Swarn Singh
- May 2
- 2 min read
यदि शासन व्यवस्था को अनपढ़ मूर्ख नेताओं के हवाले ही करना था, तो फिर मुगलों और अंग्रेजों में क्या दोष था ? राजतंत्र में आखिर ऐसी क्या कमी थी जो हमें इस 'संवैधानिक अराजकता' को चुनना पड़ा ?
कहा जाता था कि जातिवाद बीते दौर की एक सड़न है, एक बीमारी है। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि जातिवाद अब बीमारी नहीं, इस देश की 'ऑपरेटिंग सिस्टम' (व्यवस्था) बन चुका है।
तब और अब में फर्क सिर्फ इतना है कि तब दुश्मन की पहचान साफ थी, आज सब कुछ 'संवैधानिक आवरण' के पीछे छिपा है। आज जब शिक्षा का अधिकार घर-घर पहुंच चुका है, तब अंगूठाछाप और अपराधी सत्ता के शिखर पर कैसे बैठे हैं? क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ सिरों की गिनती है, चाहे उन सिरों के भीतर गोबर भरा हो?
क्या संवैधानिक पदों के लिए शिक्षा का कोई न्यूनतम मापदंड नहीं होना चाहिए?
विडंबना देखिए कोई भी ब्राह्मण रावण की पूजा नहीं करता, लेकिन आज के इस सड़े हुए लोकतंत्र में हर जाति ने अपने-अपने 'जातीय रावणों' को पूजना शुरू कर दिया है। हमने यह कैसी व्यवस्था गढ़ ली है, जहाँ अपराधी होने का ठप्पा आपकी योग्यता बन गया है? क्यों अपने अपने जाति का अपराधी समाजसेवी लगने लगता है ?
राजतंत्र में ब्राह्मणवादी व्यवस्था की वजह से कुछ वर्ग शिक्षा से वंचित थे, लेकिन आज के लोकतंत्र ने तो शिक्षा के चरित्र को ही कलंकित कर दिया है। एक दौर था जब सिर्फ एक 'आरोप' लगने पर राजनेता सार्वजनिक पदों से इस्तीफा दे दिया करते थे, और आज का दौर है जहाँ संगीन अपराध ही सर्वोच्च पद पाने की अनिवार्य 'योग्यता' बन गए हैं।
जिस देश का संविधान समानता की शपथ लेता हो, वहां मानसिकता इतनी विषैली कैसे हो गई? कभी-कभी लगता है कि सारे स्कूल-कॉलेजों पर ताला लगा देना चाहिए। क्योंकि जब एक पढ़ा-लिखा IAS या IPS ऐसे जाहिल नेताओं के आदेश पर सिर झुकाता है, तब सिर्फ उसकी डिग्री ही नहीं मरती... बल्कि पूरे समाज का ज़मीर मर जाता है। पर सब चुप हैं। और यह चुप्पी डरावनी है।
अब बुद्ध, महावीर और गुरु गोविंद सिंह की तपोभूमि के गुणगान मत कीजिए। अब UPSC/IIT/Banking में चयन की संख्या और नालंदा की महानता का राग मत अलापिए। क्योंकि जब कोई भी समाज अपना योग्य नेतृत्व तक पैदा करने की क्षमता खो दे, तो ये सारी ऐतिहासिक उपलब्धियां खोखली और बेशर्मी भरी लगने लगती हैं।
चुनाव चाहे EVM से हों या बैलेट पेपर से, अब क्या फर्क पड़ता है? जब वोट देने वाली सोच ही दूषित हो, तो परिणाम तो वही होगा "Garbage In, Garbage Out.
तरस आता है किसी राज्य के पढ़े-लिखे युवाओं पर और उन आलीशान इमारतों पर जिन्हें हम स्कूल-कॉलेज कहते हैं।
और सुनिए, अब बख्तियार खिलजी को दोष देना बंद कर दीजिए कि उसने नालंदा जलाया था। उसने तो सिर्फ एक विश्वविद्यालय की इमारत जलाई थी... आपने तो पूरे राज्य की 'शिक्षित चेतना' को ही जलाकर राख कर दिया है।
अब कुछ कहने को बचा नहीं है। बस... अब 'विश्वगुरु' बनना बाकी रह गया है!



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