कलयुग में कलयुगी विभीषण
- Swarn Singh
- Apr 21
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Updated: May 5
खुदगर्जी के लालच में,
अपने खून का भी हो न सका,
कलयुग में भी कलयुगी विभीषण,
चैन की नींद कभी सो न सका !
छल की चादर ओढ़ के बैठा,
खून के रिश्तों का हत्यारा,
बेच दिया है कुल का गौरव,
छोड़ कर नदी का किनारा!
बाहर तो मुस्कान सजी है,
पर भीतर गरल समाया है,
अपनों की ही बलि देकर,
झूठ का साम्राज्य सजाया है !
घर में वैभव बिखरा है,
पर मन में गहरी खाई है,
जिसने अपनों से दगा किया,
उसने बस रुसवाई पायी है !
गद्दारी का दाग ललाट पर,
चंदन सा अब लगता नहीं,
भीतर का जो चोर जगा हो,
फिर दीपक कोई जगता नहीं !
नीति और मर्यादा छोड़ी,
छोड़ दिया ईमान धर्म,
दुश्मन की चौखट पर जाकर,
किया सदा ही नीच कर्म!
कपट से थाली में परोसा,
अपनों का ही मान सम्मान,
गिरा दिया है खुद ही अपने,
घर-परिवार का स्वाभिमान!
दूर हो गया वो अपनों से ही,
गैरों के बहकावे में,
इक दिन बिलखेगी आत्मा उसकी,
पछतावे के साए में!
कलयुग के इस विभीषण को,
अब कोई राम न मिल पाएगा,
जो विश्वास का जड़ ही काट दिया,
वहां फूल कहाँ फिर खिल पाएगा!
अहंकार और लालच में आकर,
अपने कुल का भी हो न सका,
कलयुग में भी कलयुगी विभीषण,
चैन की नींद कभी सो न सका!




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