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“अगौ” (या “अगाऊ / अगवाँ”)

गांव की उस पुरानी परंपरा की सुगंध आज भी मिट्टी में बसी है जहाँ अन्न केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और सम्मान का प्रतीक था।

जिस प्रथा की बात मैं  करने जा रहा हूँ , उसे आम तौर पर “अगौ” (या “अगाऊ / अगवाँ”) कहा जाता था या है । यह शब्द अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़ा बदल जाता था, लेकिन भाव एक ही रहता था  फसल का वह हिस्सा जो पहले से ही पंडित या पुरोहित के लिए निश्चित होता था।

इसका अर्थ और परंपरा

  • “अगौ” का मतलब होता है पहले से दिया गया या तय हिस्सा

  • किसान जब फसल काटता था, तो उसमें से एक भाग:

    • पंडित / पुरोहित

    • या गांव के धार्मिक कार्यों के लिए अलग निकाल देता था

  • यह केवल दान नहीं था, बल्कि धर्म और सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा था

इस परंपरा के साथ कुछ और शब्द भी प्रचलित थे:

  • दक्षिणा – पूजा या संस्कार के बाद दिया जाने वाला मान

  • दान / भेंट  स्वेच्छा से दिया गया अन्न या धन

  • जजमानी प्रथा   जिसमें पुरोहित और अन्य सेवा देने वाले वर्गों को नियमित हिस्सा मिलता था

यह “अगौ” केवल अन्न का हिस्सा नहीं था यह उस विश्वास का प्रतीक था कि “जो कुछ मिला है, उसमें समाज और धर्म का भी अधिकार है।”

आज समय बदल गया है, पर उस परंपरा में एक सामूहिकता थी जहाँ खेत की हर बालि में केवल किसान का नहीं, पूरे गांव का अंश माना जाता था। खेती के बाद फसल का हिस्सा पंडित, नाई, धोबी, लोहार, बढ़ई, चरवाहा आदि को देने की परंपरा भारत के गांवों में बहुत पुरानी थी। यह अधिकतर जजमानी प्रथा का हिस्सा थी।अलग-अलग प्रदेशों में इसके नाम बदल जाते थे।


कुछ प्रमुख क्षेत्रीय नाम


  • बिहार / पूर्वी उत्तर प्रदेश 

    • अगौ / अगवाँ / अगाऊ :- पहले से निश्चित हिस्सा 

    • सेवाधान :-सेवा के बदले दिया गया अनाज 

    • नेग :-संस्कार या अवसर पर दिया जाने वाला हिस्सा/उपहार 

  • उत्तर प्रदेश (पश्चिमी भाग) 

    • नेग 

    • सीधा — पूजा या संस्कार के लिए दिया गया अनाज, घी, दाल आदि 

  • राजस्थान 

    • लाग-बाग 

    • दस्तूर 

  • मध्य प्रदेश / छत्तीसगढ़ 

    • पौती / हिस्सेदारी जैसे स्थानीय शब्द मिलते हैं 

  • महाराष्ट्र 

    • बलुतेदारी प्रथा :-यहाँ गाँव के 12 पारंपरिक सेवा-समुदायों को फसल या उपज में हिस्सा मिलता था। इसे बलुतेदारी प्रथा कहा जाता था। 

  • पंजाब / हरियाणा 

    • सेपी / हिस्सा 

    • कई जगह केवल “अनाज का हिस्सा” ही कहा जाता था 

 

एक दिलचस्प बात


अक्सर लोग समझते हैं कि यह हिस्सा सिर्फ पंडित को मिलता था, लेकिन पुराने गांवों में नाई, धोबी, कुम्हार, लोहार, बढ़ई, चरवाहा सभी का सालभर का श्रम इसी व्यवस्था से जुड़ा होता था।किसान कटाई के समय ढेर बनाता और हर व्यक्ति का हिस्सा अलग निकाल देता।  

“अगाउ” विशेषकर बिहार पूर्वी यूपी क्षेत्र के लिए काफी संभव और सही लगता है। पूर्णिया क्षेत्र में भी “अगौ/अगवाँ” जैसे शब्द प्रचलित  है।

महाराष्ट्र की बलुतेदारी प्रथा केवल अनाज बाँटने की व्यवस्था नहीं थी,बल्कि पुराने गाँवों की पूरी सामाजिक और आर्थिक धुरी थी। गाँव एक छोटे संसार की तरह चलता था किसान खेत में अन्न उगाता था, और बाकी लोग अपनी-अपनी कला, सेवा और श्रम से उस गाँव की जीवन-धारा को चलाते थे बदले में उन्हें फसल का एक निश्चित हिस्सा मिलता था। इसी हिस्से को “बलुता” कहा जाता था, और इस पूरी व्यवस्था को बलुतेदारी प्रथा कहा जाता था।

“बलुता” शब्द का अर्थ

“बलुता” का अर्थ था:

फसल या उपज में से वह तय हिस्सा, जो किसी सेवा के बदले दिया जाता था।

यह वेतन की तरह नकद नहीं होता था। प्रायः मिलता था:

  • गेहूँ 

  • ज्वार 

  • बाजरा 

  • धान 

  • दाल 

  • कभी-कभी कपड़ा, घी या अन्य वस्तुएँ 

जब कटाई होती थी, तब सेवा देने वाले समुदाय अपने हिस्से का अनाज प्राप्त करते थे।

 

बारह बलुतेदार कौन थे?

गाँव में परंपरागत रूप से “बारह बलुतेदार” माने जाते थे। क्षेत्र के अनुसार थोड़े बदलाव मिलते हैं, लेकिन सामान्य सूची कुछ इस प्रकार थी:

  1. जोशी (पुरोहित)  पूजा, विवाह, जन्म, धार्मिक संस्कार 

  2. गुरव  मंदिर की देखभाल और पूजा 

  3. सुतार (बढ़ई)  हल, बैलगाड़ी, दरवाज़े, कृषि उपकरण 

  4. लोहार  हल का फाल, कुल्हाड़ी, खेती के लोहे के औजार 

  5. कुंभार (कुम्हार)  मिट्टी के घड़े, बर्तन 

  6. न्हावी (नाई)  बाल काटना, विवाह और संस्कारों में सेवा 

  7. परीट (धोबी)  कपड़े धोना 

  8. चांभार  :-चमड़े का काम, जूते बनाना 

  9. महार :- गाँव की चौकीदारी, संदेश पहुँचाना, प्रशासनिक कार्य 

  10. मांग 

  11. रस्सी बनाना, कुछ सामाजिक सेवाएँ 

  12. सोनार 


गाँव कैसे चलता था?

कल्पना कीजिए लगभग 250 -  300 वर्ष पहले का महाराष्ट्र का गाँव किसान के पास खेत है, लेकिन खेती अकेले नहीं हो सकती।

  • हल टूटा → सुतार और लोहार चाहिए 

  • बैलगाड़ी बिगड़ी → सुतार चाहिए 

  • शादी हुई → जोशी, न्हावी, परीट चाहिए 

  • घड़े चाहिए → कुंभार चाहिए 

  • मंदिर है → गुरव चाहिए 

इसलिए गाँव केवल किसानों से नहीं चलता था। हर व्यक्ति एक-दूसरे से जुड़ा था।

कटाई के बाद किसान कहता था:

"यह हिस्सा सुतार का, यह लोहार का, यह न्हावी का..."

इस व्यवस्था की अच्छी बातें

  • हर परिवार की आजीविका सुनिश्चित रहती थी 

  • गाँव आत्मनिर्भर बनता था 

  • पैसे की आवश्यकता कम पड़ती थी 

  • सभी का श्रम गाँव से जुड़ा रहता था 

इसकी सीमाएँ भी थीं

समय के साथ इसमें कठिनाइयाँ भी दिखीं:

  • काम और जाति आपस में बँध गए 

  • व्यक्ति के लिए पेशा बदलना कठिन हो गया 

  • कुछ समुदायों को कम सामाजिक सम्मान मिला 

  • नकद अर्थव्यवस्था बढ़ने पर यह व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी 

पतन कैसे हुआ?

19वीं–20वीं शताब्दी में:

  • ब्रिटिश शासन में नकद भुगतान बढ़ा 

  • बाज़ार व्यवस्था विकसित हुई 

  • उद्योग और शहर बढ़े 

  • लोग गाँव छोड़कर नौकरियों की ओर जाने लगे 

धीरे-धीरे बलुतेदारी प्रथा कम होती गई।

एक तरह से देखें तो पुराने महाराष्ट्र का गाँव एक जीवित मशीन जैसा था कोई एक पुर्जा हट जाए, तो पूरी व्यवस्था लड़खड़ा जाती। बलुतेदारी उसी मशीन की अदृश्य डोरी थी, जिसने गाँव को पीढ़ियों तक बाँधे रखा।

 

 
 
 

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"भूख की कोई जाति नहीं,
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