अस्तित्व की अग्निपरीक्षा
- Swarn Singh
- Apr 7
- 2 min read
क्या ईरानी लोग ''साका और जौहर" की राह पर हैं?
इतिहास केवल तारीखों का पुलिंदा नहीं होता, बल्कि यह उन कौमों की गाथा है जिन्होंने झुकने के बजाय मिट जाना बेहतर समझा। आज जब हम वैश्विक पटल पर ईरान और यूक्रेन जैसे देशों को महाशक्तियों और विनाशकारी युद्धों के बीच घिरा देखते हैं, तो भारतीय इतिहास के दो शब्द स्मृति में कौंधते हैं जौहर' और 'साका'।
ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस पराकाष्ठा के प्रतीक हैं जहाँ स्वाभिमान, जीवन के मोह से बड़ा हो जाता है। जो लोग भारत की मिट्टी की तासीर और राजपूत इतिहास के 'जौहर' (सम्मान की रक्षा हेतु आत्मदाह) और 'साका' (अंतिम सांस तक लड़ने का संकल्प) को समझते हैं, वे आज ईरान और यूक्रेन के नागरिकों के अडिग हौसलों को भी समझ सकते हैं। युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि उस संकल्प से लड़ा जाता है जो कहता है "मिट जाएंगे, पर झुकेंगे नहीं।" जब किसी देश का नागरिक अपनी मिट्टी के खातिर 'सर्वोच्च न्योछावर' करने का मन बना लेता है, तो दुनिया की कोई भी सैन्य शक्ति उसे पूर्णतः परास्त नहीं कर सकती। वजूद सिर्फ सांसें लेने का नाम नहीं है; वास्तविक वजूद वह है जो इतिहास के पन्नों में अपनी गरिमा के साथ दर्ज हो।
एक हिंदुस्तानी होने के नाते, यह सत्य है कि इन वैश्विक संघर्षों और युद्धों के कारण भारत और उसके नागरिकों को आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर कई परेशानियों का सामना करना पड़ा है। लेकिन जब हम इन तात्कालिक परेशानियों से ऊपर उठकर एक तटस्थ दृष्टिकोण से देखते हैं, तो मेरी कलम उन करोड़ों स्वाभिमानी नागरिकों के सम्मान में झुक जाती है।
वर्षों के प्रतिबंध, धमकियां और बुनियादी ढांचे की बर्बादी के बावजूद, ईरानी नागरिकों का अपने निर्णय पर अडिग रहना उनके गहरे आत्म-सम्मान को दर्शाता है।
दुनिया देख रही है कि कैसे विनाश की कगार पर खड़े होकर भी ये राष्ट्र घुटने टेकने को तैयार नहीं हैं। यह वही साहस है जो सदियों पहले भारतीय वीरों ने रणभूमि में दिखाया था।
इतिहास अक्सर विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, लेकिन याद हमेशा उन्हीं को रखा जाता है जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी अपने 'स्वत्व' को नहीं छोड़ा। यूक्रेन की सड़कों से लेकर ईरान के गलियारों तक, आज जो प्रतिरोध दिख रहा है, वह आधुनिक युग का 'साका' ही है। वजूद सिर्फ जिंदा रहने से नहीं बचता, बल्कि अपने वजूद को इतिहास के पन्नों में अमिट स्वाभिमान के साथ जिंदा रखा जाता है।"
आज दुनिया भले ही इन देशों को सामरिक और रणनीतिक चश्मे से देखे, लेकिन आने वाली नस्लें इन्हें उन मिसालों के तौर पर याद रखेंगी जिन्होंने समझौता करने के बजाय संघर्ष को चुना। ऐसे अदम्य साहस और हौसले को सलाम करना हर उस व्यक्ति का धर्म है जो स्वतंत्रता और स्वाभिमान की कीमत समझता है।
स्वर्ण सिंह की कलम से !





Comments