परदे की बातें
- Swarn Singh
- Apr 15
- 1 min read
Updated: Apr 27
भीड़ में शोर मचाने से अक्सर उलझ जाते हैं खून के भी रिश्ते,
कुछ गिले शिकवे खामोशी से ही सह लें, तो अच्छा लगता है ,
लफ़्ज़ों के जाल में अक्सर बातों के मतलब बदल जाते हैं,
जो बात नज़रों से नज़रों तक ही बहे, तो अच्छा लगता है !
For complete Poem read My Book " हमें और मत बाँटो'





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