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वटवृक्ष: राजपूत चौहान वंश : रजवाना से सहवान तक: इतिहास और वर्तमान

Updated: 3 minutes ago

सन ​सत्तावन की उठी क्रांति,

कांपा था अंग्रेजी राज !

मैनपुरी के तेज सिंह ने,

रणभूमि का जब बदला मिज़ाज।

खड़ा साथ में रजवाना का,

भुवन सिंह का वीर सपूत !

रणभूमि में झोटी सिंह थे,

गोरों के खातिर साक्षात् यमदूत।

​बिजली सी तलवार चली तो,

कटे फिरंगी अफ़सर क्रूर,

अंग्रेजों की भारी तोपें भी,

कर न सकीं साहस को चूर।

दो हज़ार की सेना आई,

ढाई सौ वीर बलिदान हुए ,

छूट गई जन्मभूमि तो क्या,

कभी स्वाभिमान के मस्तक न खोए।

फिर पूरब की दुर्गम राहों से,

राज दरभंगा चल कर आए।

सच्चा योद्धा छिपकर भी,

रखता वीरों सा अंदाज़,

संकट में जब ढाल बने तो,

मान गए मिथिला-महाराज।

​अदम्य वीरता देख नृपति ने,

सहर्ष उन्हें सम्मान दिया,

ताम्रपत्र का गौरव देकर,

सौ एकड़ का दान दिया।

उसी मान को साथ लिए वे,

दरभंगा से सहवान पधारे,

खड्ग उठाने वाले हाथों ने,

हल धर कर भू-भाग सँवारे ।

​नई धरा को सींच-सींच कर,

एक नया इतिहास बनाया !

कुछ कहानियाँ जो पीढ़ियों से सुनी जा रही हैं, कुछ किंवदंतियाँ जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही हैं, और कुछ सच्चाइयाँ जो कभी नहीं बदलतीं उन्हें किसी किताब के पन्नों में सहेजना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। किंतु ऐसी चुनौतियों का सामना करने का साहस, पीढ़ियों की समृद्ध परंपरा, उच्च आदर्शों और बुजुर्गों के आशीर्वाद से ही संभव हो पाता है। ईश्वरीय कृपा से मुझे यह सौभाग्य और आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।

​मुझे यह लिखते हुए अत्यंत गर्व की अनुभूति हो रही है कि कैसे एक व्यक्ति से एक परिवार बना, फिर एक परिवार ने एक टोले का और उस टोले ने एक पूरे गाँव का रूप ले लिया। यह समझना बहुत ही सहज है कि जब भी किसी गाँव की चर्चा होती है, तो बरगद का पेड़ अनायास ही क्यों याद आ जाता है। बरगद के पेड़ और गाँव का आखिर क्या संबंध है? इसे कुछ इस तरह समझिए कि झोटी सिंह महज़ एक नाम नहीं थे, आज उनका वंश एक बरगद के पेड़ की भाँति इतना विशाल बन चुका है, और उसकी जड़ें इतनी गहरी होकर गाँव, शहर और देश भर में फैल चुकी हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ इस पुस्तक के माध्यम से अपने इस गौरवशाली अतीत को पढ़कर स्वयं पर गर्व महसूस करेंगी।

​इस यात्रा की शुरुआत उस कालखंड से होती है, जब सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति की ज्वाला भड़क उठी थी। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में इस विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे वहाँ के युवा शासक महाराजा तेज सिंह चौहान (जिनका जन्म लगभग 1834 ई. में हुआ था)। महाराजा तेज सिंह मैनपुरी रियासत के चौहान राजपूत शासक थे, जो 1851 में अपने पिता नरपत सिंह के बाद महज 15-17 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठे थे। 1857 के महासंग्राम में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया और मैनपुरी को कुछ समय के लिए ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त करा लिया। मैनपुरी के चौहान दिल्ली के महान शासक पृथ्वीराज चौहान के सीधे वंसज माने जाते है ! तेज सिंह को स्थानीय रूप से वीर और देशभक्त के रूप में याद किया जाता है।तेज सिंह का किला (महाराजा तेज सिंह चौहान फोर्ट) आज भी 1857 की याद दिलाता है। यह पुरानी मैनपुरी (चौथियाना) में स्थित है, हालांकि रखरखाव की कमी से खंडहर जैसी स्थिति में है।

​मातृभूमि को बेड़ियों से मुक्त कराने के इस महायज्ञ में महाराजा अकेले नहीं थे; उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे मैनपुरी के भोगांव तहसील (वर्तमान सुल्तानगंज ब्लॉक) के रजवाना गाँव के वीर सपूत झोटी सिंह भुवन सिंह के ज्येष्ठ पुत्र झोटी सिंह अपने अदम्य साहस और युद्ध कौशल के लिए जाने जाते थे। रणभूमि में उनकी तलवार बिजली की तरह चमकती थी। जब अंग्रेजों और उनकी फ़ौज से सीधी भिड़ंत हुई, तो झोटी सिंह जी ने अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लगभग एक दर्जन क्रूर अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया । उनका खौफ अंग्रेजी खेमे में इस कदर फैल गया था कि वे फिरंगियों की आँखों की किरकिरी बन गए।

​विद्रोह को कुचलने के लिए अंततः दिल्ली से भारी ब्रिटिश फौज मँगवाई गई। लगभग दो हज़ार सुसज्जित ब्रिटिश सैनिक और तोपखाने मैनपुरी की ओर कूच कर चुके थे। महाराजा तेज सिंह और झोटी सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने डटकर मुकाबला किया, लेकिन सीमित संसाधनों और तोपों की कमी के कारण वे अंग्रेजी तोपखाने के सामने टिक नहीं सके। इस भीषण युद्ध में उनके 250 वीर अनुयायी शहीद हो गए और उनकी तोपें अंग्रेजों द्वारा छीन ली गईं। अक्टूबर 1857 में ब्रिगेडियर 'होप ग्रांट' की ब्रिटिश सेना ने मैनपुरी पर कब्जा कर लिया। भारी नुकसान के बाद, महाराजा तेज सिंह चौहान को रणभूमि छोड़नी पड़ी और वे केवल 16 वफादार साथियों के साथ लखनऊ की ओर निकल गए।

​अंग्रेज अफसरों की हत्या करने के कारण झोटी सिंह ब्रिटिश हुकूमत के लिए "मोस्ट वांटेड" (सर्वाधिक वांछित) बागी घोषित हो चुके थे। उनके सिर पर इनाम था और अंग्रेज सिपाही हर जगह उनकी तलाश कर रहे थे। अपने प्राणों और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अंततः झोटी सिंह को अपनी जन्मभूमि मैनपुरी छोड़नी पड़ी। वे अज्ञातवास में लंबी और दुर्गम यात्रा करते हुए पूरब की ओर निकल गए और अंततः उन्हें बिहार के राज दरभंगा में शरण मिली। अपनी पहचान छिपाकर वे वहाँ कई वर्षों तक रहे। पर कहते हैं न, एक सच्चा योद्धा कभी अपनी प्रकृति नहीं छोड़ता, चाहे वह रणभूमि में हो या अज्ञातवास में। राज दरभंगा में रहते हुए एक दिन एक ऐसा संकटपूर्ण अवसर आया जहाँ झोटी सिंह को अपना शौर्य दिखाने का मौका मिला। उन्होंने एक असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया, जिसने दरभंगा महाराज को अत्यंत प्रभावित कर दिया । इस बहादुरी से प्रसन्न होकर दरभंगा महाराज ने उन्हें शाही दरबार में समारोह आयोजित कर सम्मानित किया। पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक ताम्रपत्र और 101 एकड़ उपजाऊ ज़मीन दी गई। एक बागी और निर्वासित योद्धा के लिए यह एक पुनर्जीवन था।

​दरभंगा महाराज से मिले इसी ताम्रपत्र और सम्मान को लेकर झोटी सिंह जी पूर्णिया जिले के काझा कोठी में रहने आ गए। जहाँ कभी उनके हाथों में फिरंगियों का खून पीने वाली तलवार हुआ करती थी, वहाँ अब उन्होंने इस 101 एकड़ जमीन पर कृषि के माध्यम से एक नए जीवन का श्रीगणेश किया। जब काझा कोठी में उनके पाँव जम गए और जीवन में स्थिरता आ गई, तो उन्हें अपनी जन्मभूमि और परिवार की याद आई। कुछ समय पश्चात, उन्होंने मैनपुरी से अपने छोटे भाई श्रवण सिंह और अपने परिवार को भी सुरक्षित पूर्णिया बुलवा लिया।

​दोनों भाइयों ने मिलकर अपनी मेहनत, पसीने और लगन से उस नई धरती को सींचा। उन्होंने अपनी इस ज़मीनी विरासत को चार कामतों दमगड़ा, खनुवा, हलालपुर और पुरानी के रूप में विस्तृत करते हुए लगभग आठ सौ एकड़ जमीन तक पहुँचा दिया था। समय के साथ काझा कोठी में कुछ असुविधा होने के कारण वे उसे छोड़कर खनुवा के पास 'हलालपुर' आ गए। इसके कुछ बरसों पश्चात उनका नया बसेरा 'सहवान खूँट' में हुआ। वहाँ से वे उस स्थान पर बसे जहाँ आज 'डीह मुसहरी' बसा हुआ है, और अंततः कुछ समय बाद वहाँ से विस्थापित होकर उस स्थान पर आ गए जहाँ आज हमारा वर्तमान गाँव बसा हुआ है क्योंकि उस समय वहाँ पहले से ही इकतालीस राजपूत परिवार निवास करते थे । साथ ही, कृषि कार्यों में सहयोग के लिए कुछ हरिजन समुदाय के परिवारों को भी अपनी ही ज़मीन पर बसाया गया ! हरिजन समुदाय से भरपूर सहयोग मिला लेकिन इतनी विशाल खेती गृहस्थी के लिए वह पर्याप्त नहीं था ! फिर दुमका जो कि आजकल झारखंड में है से कुछ आदिवासी समुदाय को धार (नदी) के किनारे किनारे बसाया गया ! आदिवासी समुदाय काफी मेहनती और सक्षम थे खेती के काम में सहयोग के लिए। कालचक्र अपनी गति से चल रहा था कि तभी एक वक़्त ऐसा आया जब इलाके में हैज़े (महामारी) का भयंकर प्रकोप फैला। इस महामारी ने कई लोगों की जान ले ली और भयभीत होकर बहुत से लोग गाँव से पलायन कर गए। लेकिन इस भीषण आपदा और मृत्यु के तांडव के बीच भी जो जड़ें अडिग रहीं, जो वटवृक्ष अपनी जगह खड़ा रहा वह था झोटी सिंह और श्रवण सिंह जी का परिवार। क्रमशः......

 
 
 

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"भूख की कोई जाति नहीं,
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