
"भूख की कोई जाति नहीं,
न रोटी की कोई भाषा है"


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List of Poetry
हमें और मत बाँटो
गाँव का सूनापन:-कहाँ गए सब लोग ?
ये कैसा भाईचारा है ?
जख्म वही है, दर्द वही है, अश्क (आंसू) सबके खारे हैं
भाषा प्रांत के इन झगड़ों में, हम इंसानियत से हारे हैं ,
सियासत की बिसात पे देखो, कितना लुट चुके हैं हम,
मुझे और टुकड़ों में मत बाँटो, बहुत बंट चुके हैं हम !
मेरा बचपन
शहर की इस भीड़ में जब, खुद को तन्हा पाता हूँ,
बंद आँखों से मैं अक्सर, अपने गाँव चला जाता हूँ !
बहुत याद आता है मुझे, वो धूल भरा बचपन,
वो बेफिक्र हँसना, और वो अल्हड़ लड़कपन !
टूटे आईने में अपना चेहरा
गैरों के ठहाकों से, इस क़दर उदास न हो,
टूटे आईने में अपना चेहरा देख निराश न हो !
ये वक़्त की गर्द है बस, इक फूँक में उड़ जाएगी,
हीरा है तू पत्थरों के बीच रहकर हताश न हो !
चार दोस्त, मयख़ाना और रात का समाँ
खेत, पेड़, घर, आँगन, चारदीवारी और चौखट,
सब पर सन्नाटा ठहर गया,
रोटी की ख़ातिर वो पूरा कुनबा
गांव छोड़ बसने 'शहर' गया I
संसद से बाज़ारों तक, जो बारूद तुमने बिछाया है,
सच कहो, क्या यही तेरे मजहब ने तुमको सिखाया है?
मेरे बच्चों के जिस्मों के जब चीथड़े उड़ जाते हैं,
तब तुम्हारे ये अमन के नारे और भाईचारे कहाँ मर जाते हैं?
इंसा को इंसा रहने दे
विधवा माँ
न "काफ़िर" कह, न "गैर" समझ, बस इंसाँ को इंसाँ रहने दे,
नफ़रत की जो आँधी आई, उसमें खुद को मत बहने दे।
बाँट रहे जो ज़हर दिलों में, उनकी साज़िश तू पहचान,
सबका ईश्वर एक ही है, इस सच से मत हो अनजान I
छोटी छोटी बात
याद करो वो बदबूदार कमरा,
धूल-धूसरित मेरा बिस्तरा,
उम्र की लाचारी,
और मैं विधवा, बेचारी
परदे की बातें
हर एक बात पर, मत इतना विवाद किया करो,
छोटी-छोटी बात के लिए न फरियाद किया करो।
ये ज़िंदगी चंद लम्हों की मेहमान है प्यारों,
यूँ नफ़रतों में इसे न बर्बाद किया करो।
भीड़ में शोर मचाने से अक्सर उलझ जाते हैं खून के भी रिश्ते,
कुछ गिले शिकवे खामोशी से ही सह लें, तो अच्छा लगता है ,
लफ़्ज़ों के जाल में अक्सर बातों के मतलब बदल जाते हैं,
जो बात नज़रों से नज़रों तक ही बहे, तो अच्छा लगता है !
ग़फ़लत में मत रहना
फ़ितरत
चार दोस्त, मयखाना, और रात का समां,
शराब की चुस्कियों में छुपा हर गम का बयां !
हंसी-ठिठोली, और कहानियों का सिलसिला,
और तेरी खूबसूरती के किस्सों का रंगीला काफिला !
किसी ग़फ़लत में मत रहना, तेरी हर साज़िश को बेनक़ाब कर देंगे,
अब तक जितना भी दर्द दिया है तूने, सबका हिसाब कर देंगे !
ख़ामोशी मेरी फ़ितरत है, इसे मेरी हार मत समझ लेना,
जिस दिन ये समंदर उफनेगा, हर किनारे को सैलाब कर देंगे !
धर्म का धंधा
धर्म को धंधा बना दिया और इन बाबाओं ने सबको अंधा बना दिया !
जो खुद भटक रहे हैं अंधेरों में, वो हमें क्या राह दिखाएंगे?
ये तो कपड़ों के व्यापारी हैं, बस लिबास बदल कर आएंगे !
तू न हो, तो ये जहाँ अच्छा नहीं लगता
हर बार अपनी सफाई देना अब अच्छा नहीं लगता,
बार-बार न भूलने की दुहाई देना अच्छा नहीं लगता !
मैं तो तेरी यादों में खोकर खुद को भुला बैठा हूँ,
फिर भी तेरे बिना जीने का ये सवाल अच्छा नहीं लगता !
यहाँ झूठ के बाज़ार में रिश्तों के ऊँचे दाम मिलते हैं,
मगर सच बोलने वालों को सिर्फ़ इल्ज़ाम मिलते हैं !
यहाँ रुतबे को और शोहरत को सौ सलाम मिलते हैं,
मगर किरदार वालों को तो ताने सुबह-शाम मिलते हैं !
मैं भी तरक़्क़ी कर लेता
इस बड़े शहर में मैं भी तरक्क़ी कर लेता,
गर अपनी जुबां लम्बी और गर्दन नीची कर लेता
चाटुकारिता के इस दौड़ में, हाँ में हाँ मिला लेता,
सच को झूठ और झूठ को सच बना लेता I





































