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भाषा का तमाशा !

Updated: May 16

इंसान को सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह 'बोल' सकता है, इसलिए वह श्रेष्ठ है। जबकि हकीकत यह है कि हमारी बोलियों ने हमें जितना अलग किया है, उतना सरहद की कटीली तारों ने भी नहीं किया !

मैं देश के कई राज्य में रहा हूं और लगभग बहुत सारे राज्यों में घूम चुका हूं मैने देखा सुदूर पूर्वोत्तर के किसी गाँव में कुत्ता भौंकता है, तो उसकी आवाज़ महाराष्ट्र के कुत्ते से अलग नहीं होती। कोयल चाहे बंगाल में गाए या पंजाब में, उसकी “कुहू” एक-सी मधुर रहती है। कौवा बिहार का हो या केरल का, उसकी “कांव-कांव” में कोई फर्क नहीं होता है। अजीब बात है ना? क्या कभी कोई पशु पक्षी दुसरे प्रदेश के अपनी ही प्रजाति को अपनी भाषा सिखाने जाता है क्या ? फिर इतनी समानता क्यों है ? इसका कारण प्राकृतिक है !

क्योंकि वे जानते हैं कि पेट की भूख और खतरे की चेतावनी के लिए व्याकरण की नहीं, भावना की जरूरत होती है।

हैरानी की बात है कि जो प्रजाति खुद को सबसे बुद्धिमान कहती है, उसने हर 100 किलोमीटर पर एक नई दीवार खड़ी कर ली है। हमारे पास लगभग 1600 भाषाएं हैं, लेकिन विडंबना देखिए भाषाएं जितनी बढ़ती गईं, संवाद उतना ही कम होता गया।

हमने भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अहंकार का सर्टिफिकेट बना दिया है।

किसी ने खुद को कोयल मानकर दूसरों को 'कौवा' घोषित कर दिया। किसी ने अपनी भाषा को 'देववाणी' और दूसरे की बोली को 'गंवारू' कह दिया। हमने शब्दों को पुल बनाने के लिए इस्तेमाल करना था, पर हमने उनसे खाइयां खोद लीं।

आज भाषा यह तय नहीं करती कि आप क्या कह रहे हैं, बल्कि यह तय करती है कि आप कहां से आते हैं । अगर आप खास लहजे में बात नहीं करते, तो समाज आपको "अपने जैसा" मानने से इनकार कर देता है।

कटाक्ष यह है कि कुत्ता कुत्ता ही रहता है चाहे वह कहीं भी भौंके, पर इंसान अपनी भाषा बदलते ही खुद को दूसरे इंसान से श्रेष्ठ या अलग समझने लगता है।

प्रकृति आज भी हमें यही सीख दे रही है कि विविधता एकता में बाधा नहीं है। असली समस्या भाषा की संख्या नहीं, बल्कि हमारे दिलों का संकरापन है। जिस दिन हम शब्दों के पीछे छिपे इंसान को देखना शुरू कर देंगे, उस दिन 1600 भाषाएं भी कम पड़ेंगी अपनापन जताने के लिए। पर फिलहाल, हम अपनी-अपनी भाषाओं के पिंजरों में बंद होकर एक-दूसरे पर चिल्लाने में व्यस्त हैं।

काश हम बोलने की कला सीखने से पहले, मौन रहकर समझना सीख पाते। भाषाएं दिलों को जोड़ने का रास्ता थीं, उन्हें नफरत का नक्शा मत बनाइए।

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"भूख की कोई जाति नहीं,
  न रोटी की कोई भाषा है"     

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